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महसूस

कई बार ऐसा हुआ है उसे मैंने महसूस किया है
आँखों का भ्रम कहो या मन का धुंदला विश्वास
कई बार उसने मेरे कंधो पे हाथ रखा है
जब भी पलट कर देखा वो धुंदला नज़र आया है

कई बार ऐसा हुआ है उसे मैंने महसूस किया है
उसने आँखों की सुजन को भी पढ़ा है
पहली बूँद जो टपकी झट से उसने  उठाया है
जब भी दूसरी बूँद टपकी मैंने उसे पिया है

कई बार ऐसा हुआ है उसे मैंने महसूस किया है
उसने मेरे उलझे बालों को सहलाया है
पहली लट जो उडी थी कानो के पीछे उसने घुमाया है
दूसरी लट जो उडी थी आँखों को उन्होंने चुभाया है

कई बार ऐसा हुआ है उसे मैंने महसूस किया है

अस्तित्व

I wrote this poem in 1999 showing the clash between the egoes of a mighty sun (read : man) and a humble ray (read  : woman). I hope these metaphors try to get the message of the poem across to my readers. Its petty amateurish please bear the fact that it is written in 99…I was still in middle school…. ;)

अस्तित्व
आकाश पर चढ़ते सूरज ने
पुछा एक अटपटा सा सवाल
क्या तेज है तुम में मुझ जैसे चमकने का ?
अभी अभी उगी एक किरण ने
इठलाके कुछ यूँ कहा :
‘ तेज तो नहीं है मुझ में तुम जैसे चमकने का,
पर लालिमा का श्रेय तो मुझे ही जाता है,
जो छटकती है ज़मीन पर मेरे आँचल से,
और किरण किरण मिलकर
फैलाती है उजाला
अब कहो क्या जोर है तुम में
ज़मीन पर गिरकर उजाला फेलाने का ? ‘
सूरज देख कर किरण की दृढ्ता
कुछ सकपका सा जाता है,
मुकर कर कहता है:
‘दिन रात जल जल कर
भस्म होता हूँ मैं
ताकि दुसरे जीवन व्यापन कर सके
तुम तो सिर्फ पहुचाती हो उजाला,
मैं तो उजाला देकर, खुद खो जाता हूँ अँधेरे में
अब तुम कहो क्या जोर है तुम में खुद को भस्म करने का ? ‘
किरण मुस्कुराती है और कुछ यूँ कहती है :
‘तुम तो उजाला देने के लिए बस रात भर जाते हो अन्धकार में,
पर उजाला देने के बाद मैं मिलती हूँ धरा से
समाप्त करती हूँ अपना अस्तित्व गिर गिर के
अब तुम कहो क्या जोर है तुम में –
अपना अस्तित्व समाप्त करने का? ‘

पुरानी डायरी

सालो बाद निकली स्टोर रूम सेधुल सनी पुरानी डायरीयादो की बारात निकालीधुल सनी पुरानी डायरीबचपन के दिन, दादाजी के साथ खेल के दिन,वो जिद के दिन, मासूमियत के दिन,शरारतो के दिन, माँ से डांट खाने के दिनयादो की बारात निकालीधुल सनी पुरानी डायरीतीन पहियों वाली साइकिल को खीचने के दिनअपने जन्मदिन के इंतज़ार के दिन,दोस्तों से चिढ़ने बिगाड़ने के दिनकभी अब्बा तो कभी कट्टी करने के दिनयादों को अब्बा कहतीयादो की बारात निकालीधुल सनी पुरानी डायरी
सालो बाद निकाली स्टोर रूम से
धुल सनी पुरानी डायरी
यादो की बारात निकाली
धुल सनी पुरानी डायरी
बचपन के दिन, दादाजी के साथ खेल के दिन,
वो जिद के दिन, मासूमियत के दिन,
शरारतो के दिन, माँ से डांट खाने के दिन
यादो की बारात निकाली
धुल सनी पुरानी डायरी
तीन पहियों वाली साइकिल को खीचने के दिन
अपने जन्मदिन के इंतज़ार के दिन,
दोस्तों से चिढ़ने बिगाड़ने के दिन
कभी अब्बा तो कभी कट्टी करने के दिन
यादों को अब्बा कहती
यादो की बारात निकाली
धुल सनी पुरानी डायरी

सालो बाद निकाली स्टोर रूम से

धुल सनी पुरानी डायरी

यादो की बारात निकाली

धुल सनी पुरानी डायरी

बचपन के दिन, दादाजी के साथ खेल के दिन,

वो जिद के दिन, मासूमियत के दिन,

शरारतो के दिन, माँ से डांट खाने के दिन

यादो की बारात निकाली

धुल सनी पुरानी डायरी

तीन पहियों वाली साइकिल को खीचने के दिन

अपने जन्मदिन के इंतज़ार के दिन,

दोस्तों से चिढ़ने बिगाड़ने के दिन

कभी अब्बा तो कभी कट्टी करने के दिन

यादों को अब्बा कहती

यादो की बारात निकाली

धुल सनी पुरानी डायरी

Wrote this poem in 1999, I found my old diary today sharing one of the poems with you :)

Wrote this poem in 1999. I found my old diary today; sharing one of the poems with you :)

कुछ इस तरह

The recitation of this poem in my voice is available here, http://soundcloud.com/md610/kuch-is-tarah

कुछ  नमी सी थी उन आँखों में जब आखरी बार बंद किया था,
एक जलन सी थी उन आँखों में जब आखरी बार उन्हें पोछा था

पलकों की शिकायत भी कम न होती थी जब आखरी बार उन्हें मसला था
सूखे हुआ गालो पे जब हाथ अपना फेरा था

रोते हुए चेहरे के रंग को एक बार फिर से यूं खिलाया था
कोई देख न ले रोते हुए इस डर से आंसुओं को छुपाया था

कोई जान न ले उन आँखों के टूटे सपनो को
इस चिंता में उन्हें कुछ पिघलाया था

कोई हँसे न बेबसी पे मेरी, इस उलझन में चेहरा मुस्काया था
हंसती हुई आँखों ने फिर से यूं आंसुओं को छलकाया था